भारत का जनगणना ओर ब्राह्मणबाद:

2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 की जनगणना:

Indian Census, logo


प्रथम विश्वयुद्ध खत्म हो चूका था, युद्ध भड़काने का दोष जर्मनी पर मढ़ा गया । यूरोप के देशों ने जर्मनी पर ट्रीटी ऑफ़ वेरसैल्स थोपकर अफ्रीका के कई देश जिन पर जर्मनी का शासन था उन्हें अन्य यूरोप के देशों को सौंप दिया ! इन में एक देश रवांडा था जिसे बेल्जियम के हवाले किया गया । छोटा सा बेल्जियम रवांडा पर कंट्रोल नही कर पा रहा था, हमेशा कहीं न कहीं से विद्रोह की आग भड़क उठती ।

बेल्जियम ने डिवाइड एंड रूल नीति के तहत रवांडा के लोगो को तीन हिस्से में बाट दिया । एक जैसे दिखने वाले लोगो को टुटसी हुतु और त्वा में बाटा ।

बाटने का तरीके अजीबो गरीब जो परिवार सबसे लंबे कद काठी के थे उन्हें टुटसी का दर्जा दिया । मध्यम कद काठी वालों को हुतु और इससे भी कम कद काठी वालों को त्वा बनाया गया । नापने में नाक आंख कान नाक तक नापे गए ।

टुटसी को माइनॉरिटी बनाकर बेल्जियम सरकार ने उन्हें ज़मीन और अधिक पशु देकर अन्य लोगो से समृद्ध बनाया । टुटसी को अधिक अधिकार मिलने से हुतु लोगों में असमानता ने जन्म लिया ।

टुटसी को बेल्जियम सरकार ने सरकारी ठेके शिक्षा और अन्य कई रियात दी और उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों से कर वसूलने के अधिकार भी मिले, टुटसी समुदाय हुतु त्वा समुदाय से दूर रहने लगे और खुद को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे । इससे हुतु और त्वा के लोगो में टुटसी के प्रति रोष उत्पन होने लगा ।

बेल्जियम सरकार अपने छल कपट में सफल हुई, बहुसंख्यक हुतु के लिए दुश्मन बेल्जियम नही अब टुटसी थे और टुटसी के लिए हुतु । टुटसी हुतु त्वा की टूट का फ़ायदा बेल्जियम ने भरपूर उठाया ।

कुछ इसी प्रकार मुट्ठी भर ब्राह्मणों ने डिवाइड एंड रूल नीति पर चलते हुए बौद्ध भूमि भारत को जातियों में बांट दिया ।

हर जाति के ऊपर बड़ी जाति और नीचे छोटी जाति लेकिन सिर्फ ब्राह्मण जाति के ऊपर कोई जाति नही । ब्राह्मणवाद से लड़ने के बजाय हर जाति आपने से ऊपर या नीचे की जाति से लड़ने लगी ।

आज भी भारत में बहुजन समाज आपस में जाति के नाम पर लड़ रहे हैं, लेकिन जाति बनाने वाले ब्राह्मण से टकराने की कोई हिम्मत नहीं कर पा रहा है ।


जारा गौर किजीऐ, गुलाम भारत में अंतिम बार 1931 में ओबीसी को गिना गया था कि इसकी संख्या 52%हैं । आजादी के बाद आजाद भारत में गिनती रोक दि गई क्यों? आरक्षण आरक्षण हम चिल्लाते रहते हैं जिसको भारत में आरक्षण कहते हैं ये आरक्षण नही है ये प्रतिनिधित्व है । प्रतिनिधित्व का मतलब "शेयर इन पावर" अर्थात "सत्ता में भागीदारी" होती है इसको ओबीसी को समझना पडे़गा; समझकर सड़कों पर आना होगा । क्योंकि जनगणना वाला साल 2021 एक बार फिर बहुजन के बीच आयेगा और उसके पहले 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं । देश में चुनाव ही ओबीसी की दिशा और दशा तय करेगा । ओबीसी के लोग ज्यादातर भाजपा या कांग्रेस में बटे हुए हैं । इस पार्टी वाद से उपर उठकर अपने हितों की रक्षा के लिए 2019 मे अपने मताधिकार का प्रयोग सिर्फ इसलिए करना है कि 2021 मे ओबीसी की अलग गिनती हो । जैसे एससी एसटी की है और बाकी वर्गों की होती है ।

देश में  52%और 27%, पहला आकडा आजादी के पहले का है । दुसरा आकडा आजादी के बाद का है । दूसरा आकडा मंडल कमिशन का है न कि जनगणना का । जनगणना 1951, 1961, 1971, 1981, 1991, 2001, 2011 इतनी बार जनगणना की गयी और ओबीसी को नहीं गिना गया लिपापोती करने के लिए आयोगों का गठन किया जाता है ।

2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 की जनगणना को ध्यान में रखते हुए शासक वर्ग ओबीसी को गुमराह करने के लिए मंदिर मस्जिद, भ्रष्टाचार, राफेल डील और भी न जाने ओबीसी का ध्यान बंटाने के लिए । कैसे कैसे मुद्दे मार्केट में लेकर आयेगे । बहुजन समाज सावधान रहने की जरूरत है । बहुजव अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटाना है ।

बाबासाहब डा.भीमराव अम्बेडकर कहा करते थे कि' , "ब्राह्मण हमारे लोगों को पोजिशन देते हैं, वे हमें पॉवर नहीं देते हैं "

पोजिशन और पॉवर में अन्तर होता है । पोजिशन का मतलब कैबिनेट मिनिस्टर है तो बैठने के लिए केबिन रहने के लिए कोठी दिया गया, लालबत्ती की गाड़ी दी गई । खाना बनाने के लिए खानसामा दिया गया । दो-चार चपरासी और क्लर्क दिए गए । इसको पोजिशन कहते हैं । पॉवर का क्या मतलब होता है? पॉवर का मतलब है कि ऐसी सत्ता जिसमें निर्णय करने का अधिकार हो; जो अधिकार बहुजन लोगों के मंत्रियों को नहीं दिया जाता है । इसलिए बहुजन किसी आदमी का कोई काम नहीं होता है, इस सिस्टम में बहुजन लोगों को नोमिनेट किया जाता है । नोमिनेट करके लोगों को दिखाया जाता है और बहुजन लोगों का वोट लिया जाता है । भारत के बहुजन लोगों को लगता है कि यह देने का मामला है । लेकिन यह देने का मामला नहीं है, बल्कि यह लेने का मामला है । इस तरह से ये सारी धोखाधड़ी भारत के बहुजन लोगों के साथ लगातार हो रही है ।